One of the most persistent and annoying myths in the North Indian psyche is that Hindi is the “National Language” (Rashtra-Bhasha) of India. The “Hard Talk” for the North is this: India does not have a National Language. It has “Official Languages.” This is not just a semantic quibble; it is a foundational constitutional reality that the North has spent decades trying to obscure.
Article 343 of the Indian Constitution designates Hindi in the Devanagari script as the “Official Language” (Raj-Bhasha) of the Union, but it explicitly maintained English for all official purposes for a period of fifteen years, a period that has been indefinitely extended by the Official Languages Act of 1963. The architects of our Constitution, recognizing the immense linguistic diversity of the nation, wisely avoided the designation of a single National Language. They understood that to do so would be to disenfranchise hundreds of millions of non-Hindi speakers.
The North must undergo a constitutional re-education. When you claim Hindi is the “National Language,” you are displaying a profound ignorance of the social contract that holds this Union together. The Eighth Schedule of the Constitution lists 22 languages, each of which is a sovereign expression of Indian identity. Tamil, Telugu, Kannada, and Malayalam are not “sub-languages”; they are equal in status to Hindi. To the South, the push for Rashtra-Bhasha is perceived as a form of internal colonialism. We are a “Union of States,” not a “Hindi-speaking Monolith.” If the North wants a unified India, it must first accept a multilingual India. Respect the Constitution, respect the law, and stop inventing national mandates where none exist.
उत्तर भारतीय मानस में सबसे स्थायी और कष्टप्रद मिथकों में से एक यह है कि हिंदी भारत की “राष्ट्रभाषा” है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। भारत में “राजभाषा” (Official Languages) हैं। यह केवल एक भाषाई सूक्ष्मता नहीं है; यह एक बुनियादी संवैधानिक वास्तविकता है जिसे उत्तर ने दशकों से छिपाने की कोशिश की है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 343 देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की “राजभाषा” (Official Language) के रूप में नामित करता है, लेकिन इसने स्पष्ट रूप से पंद्रह वर्षों की अवधि के लिए सभी आधिकारिक उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी को बनाए रखा, एक ऐसी अवधि जिसे 1963 के राजभाषा अधिनियम द्वारा अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया गया है। हमारे संविधान के निर्माताओं ने, राष्ट्र की विशाल भाषाई विविधता को पहचानते हुए, बुद्धिमानी से किसी एक राष्ट्रभाषा को नामित करने से परहेज किया। वे समझते थे कि ऐसा करना करोड़ों गैर-हिंदी भाषियों को उनके अधिकारों से वंचित करने जैसा होगा।
उत्तर को एक संवैधानिक पुन: शिक्षा की आवश्यकता है। जब आप दावा करते हैं कि हिंदी “राष्ट्रभाषा” है, तो आप उस सामाजिक अनुबंध के प्रति घोर अज्ञानता प्रदर्शित कर रहे होते हैं जो इस संघ को एक साथ रखता है। संविधान की आठवीं अनुसूची 22 भाषाओं को सूचीबद्ध करती है, जिनमें से प्रत्येक भारतीय पहचान की संप्रभु अभिव्यक्ति है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम “उप-भाषाएं” नहीं हैं; वे स्थिति में हिंदी के बराबर हैं। दक्षिण के लिए, “राष्ट्रभाषा” के दबाव को आंतरिक उपनिवेशवाद के एक रूप के रूप में देखा जाता है। हम “राज्यों का संघ” हैं, न कि “हिंदी भाषी एकाश्म”। यदि उत्तर एक एकीकृत भारत चाहता है, तो उसे पहले एक बहुभाषी भारत को स्वीकार करना होगा। संविधान का सम्मान करें, कानून का सम्मान करें, और वहां राष्ट्रीय अधिदेश (mandates) गढ़ना बंद करें जहां कोई अस्तित्व ही नहीं है।
उत्तर भारतीयांच्या मनातील सर्वात मोठा आणि तितकाच त्रासदायक गैरसमज म्हणजे हिंदी ही भारताची “राष्ट्रभाषा” आहे। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: भारताला कोणतीही राष्ट्रभाषा नाही। भारताला “राजभाषा” (Official Languages) आहेत। ही केवळ शब्दांची खेळाखळी नाही; तर हे एक मूळ संवैधानिक वास्तव आहे, जे उत्तर भारताने गेली अनेक दशके जाणीवपूर्वक लपवून ठेवण्याचा प्रयत्न केला आहे।
भारतीय संविधानाचे कलम ३४३ देवनागरी लिपीतील हिंदीला केंद्राची “राजभाषा” (Official Language) म्हणून दर्जा देते, परंतु त्याच वेळी संविधानाने सुरुवातीच्या १५ वर्षांसाठी सर्व अधिकृत कामांसाठी इंग्रजीचा वापर सुरू ठेवण्याची तरतूद केली होती। १९६३ च्या राजभाषा अधिनियमानुसार ही मुदत अनिश्चित काळासाठी वाढवण्यात आली आहे। भारताची अफाट भाषिक विविधता ओळखूनच आपल्या संविधान निर्मात्यांनी कोणत्याही एका भाषेला “राष्ट्रभाषा” म्हणून घोषित करण्याचे टाळले। त्यांना हे ठाऊक होते की, तसे करणे म्हणजे करोडो अ-हिंदी भाषिकांना त्यांच्या हकांपासून वंचित ठेवण्यासारखे होईल।
उत्तरेने आपले संवैधानिक ज्ञान अद्ययावत करण्याची गरज आहे। जेव्हा तुम्ही हिंदी ही “राष्ट्रभाषा” असल्याचा दावा करता, तेव्हा तुम्ही प्रत्यक्षात ज्या सामाजिक करारामुळे हा देश एकत्र आहे, त्या कराराचाच अपमान करत असता। संविधानाच्या ८ व्या अनुसूचीमध्ये २२ भाषांची यादी आहे, ज्यापैकी प्रत्येक भाषा भारतीय अस्मितेचे सार्वभौम रूप आहे। तमिळ, तेलुगु, कन्नड आणि मल्याळम या काही “दुय्यम” भाषा नाहीत; तर त्या हिंदीच्या तोडीच्या आणि समान दर्जाच्या भाषा आहेत। दक्षिण भारतासाठी “राष्ट्रभाषेचा” अट्टाहास हा एक प्रकारचा अंतर्गत वसाहतवाद वाटतो। आम्ही “राज्यांचा संघ” आहोत, केवळ “हिंदी भाषिक राष्ट्र” नाही। जर उत्तर भारताला एकसंध भारत हवा असेल, तर त्यांना आधी बहुभाषिक भारताचा स्वीकार करावा लागेल। संविधानाचा आदर करा, कायद्याचे पालन करा आणि जिथे कोणताही राष्ट्रीय आदेश अस्तित्वात नाही, तिथे स्वतःच्या मनाने तो तयार करणे थांबवा।