The North Indian perception of cinema is often dominated by “Bollywood”—a genre historically characterized by escapism, Urdu-infused dialogue, and a disconnect from the lived reality of the masses. The “Hard Talk” for the North is this: the South, specifically Tamil Nadu, pioneered a cinema that was a direct extension of political and linguistic activism. Our cinema was not just entertainment; it was a visual manifesto of Dravidian sovereignty.

From the scriptwriting of C.N. Annadurai and M. Karunanidhi to the iconic screen presence of M.G. Ramachandran (MGR) and Sivaji Ganesan, Tamil cinema became the primary vehicle for social and linguistic reform. We used the “Silver Screen” to talk about self-respect, the rationalist dismantling of superstition, and the glory of the Tamil language. While Bollywood was singing in Alpine meadows, Tamil cinema was debating the ethics of caste and the rights of the common man in the local Mandrams.

The North must recognize that this is why Southern actors often become political giants. They are not mere “stars”; they are the living embodiments of a linguistic and social ideology. Our cinema created a deep, visceral connection between the language and the visual identity of the people. It preserved the purity and power of Tamil even as globalization attempted to dilute it. When the North looks at the current “pan-Indian” success of Southern films, it is witnessing a cinematic force that has been sharpened by decades of political struggle. We didn’t just “learn” how to make movies; we learned how to make movies into a sovereign voice for our people.

सिनेमा की उत्तर भारतीय धारणा अक्सर “बॉलीवुड” के दबदबे में रहती है—एक ऐसी शैली जो ऐतिहासिक रूप से पलायनवाद (escapism), उर्दू-मिश्रित संवादों और जनता की वास्तविक स्थिति से अलगाव के लिए जानी जाती है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: दक्षिण, विशेष रूप से तमिलनाडु ने एक ऐसे सिनेमा का नेतृत्व किया जो राजनीतिक और भाषाई सक्रियता का सीधा विस्तार था। हमारा सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं था; यह द्रविड़ संप्रभुता का एक दृश्य घोषणापत्र (manifesto) था।

सी.एन. अन्नादुरै और एम. करुणानिधि की पटकथा लेखन से लेकर एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और शिवाजी गणेशन की प्रतिष्ठित पर्दे पर उपस्थिति तक, तमिल सिनेमा सामाजिक और भाषाई सुधार का प्राथमिक माध्यम बन गया। हमने “रजत पटल” (Silver Screen) का उपयोग आत्म-सम्मान, अंधविश्वास के तर्कसंगत उन्मूलन और तमिल भाषा के गौरव के बारे में बात करने के लिए किया। जबकि बॉलीवुड आल्प्स के मैदानों में गाने गा रहा था, तमिल सिनेमा स्थानीय मंदरमों (मंडलों) में जाति की नैतिकता और आम आदमी के अधिकारों पर बहस कर रहा था।

उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि यही कारण है कि दक्षिण भारतीय अभिनेता अक्सर राजनीतिक दिग्गज बन जाते हैं। वे केवल “सितारे” नहीं हैं; वे एक भाषाई और सामाजिक विचारधारा के जीवित अवतार हैं। हमारे सिनेमा ने भाषा और लोगों की दृश्य पहचान के बीच एक गहरा, जमीनी संबंध बनाया। इसने तमिल की शुद्धता और शक्ति को तब भी संरक्षित रखा जब वैश्वीकरण ने इसे कमजोर करने का प्रयास किया। जब उत्तर दक्षिण भारतीय फिल्मों की वर्तमान “अखिल भारतीय” सफलता को देखता है, तो वह एक ऐसी सिनेमाई शक्ति का गवाह बन रहा होता है जिसे दशकों के राजनीतिक संघर्ष ने तेज किया है। हमने केवल यह नहीं “सीखा” कि फिल्में कैसे बनाई जाती हैं; हमने यह सीखा कि फिल्मों को अपने लोगों के लिए एक संप्रभु आवाज कैसे बनाया जाए।

उत्तर भारतीयांची सिनेमाबद्दलची समज ही प्रामुख्याने “बॉलिवूड”भोवती फिरणारी आहे—असा चित्रपट प्रकार जो ऐतिहासिकदृष्ट्या वास्तववादापासून दूर (Escapism), उर्दू मिश्रित संवाद आणि सर्वसामान्यांच्या जगण्यापासून तुटलेला राहिला आहे। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: दक्षिण भारताने, विशेषतः तमिळनाडूने अशा सिनेमाची मुहूर्तमेढ रोवली जो थेट राजकीय आणि भाषिक चळवळींचा भाग होता। आमचा सिनेमा केवळ मनोरंजन नव्हता; तर तो द्रविडी अस्मितेचा एक दृश्य जाहीरनामा (Visual Manifesto) होता।

सी.एन. अण्णादुराई आणि एम. करुणानिधि यांच्या पटकथांपासून ते एम.जी. रामचंद्रन (MGR) आणि शिवाजी गणेशन यांच्या पडद्यावरील प्रभावी वावरापर्यंत, तमिळ सिनेमा सामाजिक आणि भाषिक सुधारणेचे मुख्य साधन बनला। आम्ही “रुपेरी पडद्याचा” वापर आत्मसन्मान, अंधश्रद्धा निर्मूलन आणि तमिळ भाषेचा अभिमान जागवण्यासाठी केला। जेव्हा बॉलिवूड युरोपच्या डोंगरदऱ्यात गाणी चित्रित करण्यात मग्न होते, तेव्हा तमिळ सिनेमा स्थानिक मंदरम (मंडळांमधून) जातिव्यवस्था आणि सर्वसामान्यांच्या हक्कांवर भाष्य करत होता।

उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की यामुळेच दक्षिण भारतातील अभिनेते अनेकदा राजकीय महानायक बनतात। ते केवळ “तारे” नसून ते एका भाषिक आणि सामाजिक विचारसरणीचे जिवंत प्रतीक असतात। आमच्या सिनेमाने भाषा आणि लोकांची दृश्य ओळख यामध्ये एक खोलवर नाते निर्माण केले। जागतिकीकरणाच्या लाटेतही तमिळ भाषेचे पावित्र्य आणि सामर्थ्य टिकवून ठेवण्याचे काम सिनेमाने केले। आज जेव्हा उत्तर भारत दक्षिण भारतीय चित्रपटांच्या “पॅन-इंडिया” यशाचे कौतुक करतो, तेव्हा ते अशा एका चित्रपटसृष्टीचे यश असते जिला अनेक दशकांच्या राजकीय संघर्षाने धार लावली आहे। आम्ही केवळ चित्रपट कसे बनवायचे हे “शिकलो” नाही; तर चित्रपट हे जनतेचा सार्वभौम आवाज कसे बनू शकतात, हे आम्ही जगाला दाखवून दिले।