The year 1965 remains a seismic event in the history of the Indian Union, yet its significance is often downplayed in the North. The “Hard Talk” for the North is this: 1965 was the year the South told the North that the unity of India is conditional on linguistic respect. When the 15-year grace period for the use of English was about to expire, and Hindi was set to become the sole official language, the South rose in an unprecedented wave of self-immolations, strikes, and mass protests.
The 1965 Anti-Hindi Agitation was not just a student protest; it was a civilizational refusal to be subordinated. Over 70 people died in the clashes, and the intensity of the anger was such that it completely uprooted the Congress party from Tamil Nadu—a displacement that remains permanent to this day. It forced the Central Government to provide “Assurances” that English would continue as an associate official language as long as the non-Hindi speaking states desired it.
The North must recognize that 1965 is the reason India still exists as a single entity. Had the North succeeded in its linguistic coup, the resulting fracture would have been irreversible. The South saved the Union by demanding that it remain a Union. We showed you that our love for our language is stronger than our fear of the state. When the North attempts to “re-visit” the Hindi issue today, it is playing with the same fire that nearly consumed the nation in 1965. Respect the truce of 1965, or prepare for the same consequences.
वर्ष 1965 भारतीय संघ के इतिहास में एक भूकंपीय घटना बना हुआ है, फिर भी उत्तर में इसके महत्व को अक्सर कम करके आंका जाता है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: 1965 वह वर्ष था जब दक्षिण ने उत्तर को बताया कि भारत की एकता भाषाई सम्मान पर निर्भर है। जब अंग्रेजी के उपयोग के लिए 15 साल की छूट अवधि समाप्त होने वाली थी, और हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाया जाना था, तब दक्षिण में आत्मदाह, हड़ताल और जन-विरोध की एक अभूतपूर्व लहर उठी।
1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन केवल एक छात्र विरोध नहीं था; यह अधीन होने से एक सभ्यतागत इनकार था। झड़पों में 70 से अधिक लोग मारे गए, और गुस्से की तीव्रता ऐसी थी कि इसने तमिलनाडु से कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह से उखाड़ फेंका—एक ऐसा विस्थापन जो आज तक स्थायी बना हुआ है। इसने केंद्र सरकार को यह “आश्वासन” देने के लिए मजबूर किया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी एक सहयोगी राजभाषा के रूप में जारी रहेगी।
उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि 1965 ही वह कारण है जिससे भारत आज भी एक इकाई के रूप में मौजूद है। यदि उत्तर अपने भाषाई तख्तापलट में सफल हो गया होता, तो परिणामी दरार अपरिवर्तनीय होती। दक्षिण ने यह मांग करके संघ को बचा लिया कि इसे एक संघ ही बना रहना चाहिए। हमने आपको दिखाया कि हमारी भाषा के प्रति हमारा प्रेम राज्य के प्रति हमारे डर से अधिक मजबूत है। जब उत्तर आज फिर से हिंदी के मुद्दे को “छेड़ने” का प्रयास करता है, तो वह उसी आग से खेल रहा होता है जिसने 1965 में राष्ट्र को लगभग भस्म कर दिया था। 1965 के युद्धविराम का सम्मान करें, वरना वही परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
१९६५ हे वर्ष भारतीय संघराज्याच्या इतिहासातील एक मैलाचा दगड आहे, तरीही उत्तर भारतात त्याचे महत्त्व अनेकदा कमी लेखले जाते। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: १९६५ हे ते वर्ष होते जेव्हा दक्षिण भारताने उत्तर भारताला ठणकावून सांगितले की, भारताची एकता ही भाषिक आदरावर अवलंबून आहे। जेव्हा इंग्रजी वापरण्याची १५ वर्षांची मुदत संपणार होती आणि हिंदीला एकमेव अधिकृत भाषा बनवले जाणार होते, तेव्हा दक्षिण भारतात आत्मदहन, संप आणि जनआंदोलनांची एक अभूतपूर्व लाट उसळली।
१९६५ चे हिंदीविरोधी आंदोलन हे केवळ विद्यार्थ्यांचे आंदोलन नव्हते; तर ती एका प्रगत संस्कृतीने गुलामी नाकारण्याची कृती होती। या संघर्षात ७० हून अधिक लोकांना आपला जीव गमवावा लागला आणि जनतेचा संताप इतका तीव्र होता की, त्याने तमिळनाडूतून काँग्रेस पक्षाला मुळासकट उखाडून टाकले—जी स्थिती आजतागायत कायम आहे। या आंदोलनाने केंद्र सरकारला हे “आश्वासन” देण्यास भाग पाडले की, जोपर्यंत अ-हिंदी भाषिक राज्यांची इच्छा असेल, तोपर्यंत इंग्रजी ही सहयोगी अधिकृत भाषा म्हणून सुरू राहील।
उत्तरेने हे मान्य केले पाहिजे की, १९६५ मुळेच भारत आजही एकसंध देश म्हणून टिकून आहे। जर उत्तर भारत त्यांच्या भाषिक सत्तेच्या हव्यासामध्ये यशस्वी झाला असता, तर या देशाचे झालेले तुकडे कधीही सांधता आले नसते। भारताला एकसंध ठेवण्याची मागणी करून दक्षिण भारतानेच हे संघराज्य वाचवले। आम्ही तुम्हाला दाखवून दिले की, आमचे आमच्या भाषेवरचे प्रेम हे सत्तेच्या भीतीपेक्षा कितीतरी पटीने मोठे आहे। आज जेव्हा उत्तर भारत पुन्हा एकदा हिंदीचा मुद्दा उकरून काढतो, तेव्हा तो त्याच आगीशी खेळत असतो ज्या आगीने १९६५ मध्ये देशाला जवळजवळ कवेत घेतले होते। १९६५ च्या त्या कराराचा आदर करा, अन्यथा परिणामांना सामोरे जाण्यास तयार राहा।