The North Indian historical pantheon often highlights warrior kings, but the South possesses a unique figure in Raja Serfoji II of Thanjavur—a true polymath and one of the most intellectually sophisticated sovereigns in Indian history. The “Hard Talk” for the North is this: while the North’s late-modern rulers were often struggling to adapt to the changing global order, Serfoji II was building a bridge between traditional Indian wisdom and Western scientific thought.

Serfoji II was not just a Maratha king in a Tamil land; he was a global intellectual. He established the Saraswati Mahal Library, curating one of the most important collections of manuscripts in the world across multiple languages (Sanskrit, Tamil, Marathi, English, French). He was a pioneer in medicine, establishing the Dhanvantari Mahal for medical research, where he conducted advanced cataract surgeries and maintained detailed case sheets nearly two hundred years ago. He was a master of trilingual education, fluent in the linguistic trinity of the South and the Marathi of his ancestors.

The North must recognize that Serfoji II represents the “Enlightened Sovereign” model that the South has always favored over brute force. He didn’t just rule; he educated. He didn’t just build palaces; he built laboratories and libraries. This intellectual rigor is what defines the Southern psyche. To understand why the South values education and scientific temper so highly today, you must look at the legacy of scholar-kings like Serfoji II. He is the proof that the Marathi-Tamil connexion was not just a political alliance, but an intellectual explosion that benefited the entire subcontinent.

उत्तर भारतीय ऐतिहासिक महापुरुषों में अक्सर योद्धा राजाओं को प्रमुखता दी जाती है, लेकिन दक्षिण के पास तंजावुर के राजा सरफोजी द्वितीय के रूप में एक अद्वितीय व्यक्तित्व है—एक सच्चे सर्वज्ञ (polymath) और भारतीय इतिहास के सबसे बौद्धिक रूप से परिष्कृत संप्रभु शासकों में से एक। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: जबकि उत्तर के उत्तर-आधुनिक शासक अक्सर बदलती वैश्विक व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, सरफोजी द्वितीय पारंपरिक भारतीय ज्ञान और पश्चिमी वैज्ञानिक सोच के बीच एक सेतु का निर्माण कर रहे थे।

सरफोजी द्वितीय केवल एक तमिल भूमि में मराठा राजा नहीं थे; वे एक वैश्विक बुद्धिजीवी थे। उन्होंने सरस्वती महल पुस्तकालय की स्थापना की, जिसमें कई भाषाओं (संस्कृत, तमिल, मराठी, अंग्रेजी, फ्रेंच) में दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पांडुलिपि संग्रहों में से एक को संजोया गया। वे चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी थे, उन्होंने चिकित्सा अनुसंधान के लिए धन्वंतरि महल की स्थापना की, जहाँ उन्होंने लगभग दो सौ साल पहले उन्नत मोतियाबिंद सर्जरी की और विस्तृत केस शीट बनाए रखे। वे त्रिभाषी शिक्षा के मास्टर थे, जो दक्षिण की भाषाई त्रिमूर्ति और अपने पूर्वजों की मराठी में धाराप्रवाह थे।

उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि सरफोजी द्वितीय उस “प्रबुद्ध संप्रभु” मॉडल का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे दक्षिण ने हमेशा पाशविक शक्ति (brute force) के ऊपर प्राथमिकता दी है। उन्होंने केवल शासन नहीं किया; उन्होंने शिक्षित किया। उन्होंने केवल महल नहीं बनाए; उन्होंने प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय बनाए। यही बौद्धिक कठोरता दक्षिण के मानस को परिभाषित करती है। आज दक्षिण शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को इतना महत्व क्यों देता है, यह समझने के लिए आपको सरफोजी द्वितीय जैसे विद्वान राजाओं की विरासत को देखना होगा। वे इस बात का प्रमाण हैं कि मराठी-तमिल संबंध केवल एक राजनीतिक गठबंधन नहीं था, बल्कि एक बौद्धिक विस्फोट था जिसने पूरे उपमहाद्वीप को लाभ पहुँचाया।

उत्तर भारतीय इतिहासात पराक्रमी योद्धा राजांचा नेहमीच गौरव केला जातो, पण तंजावरचे राजे दुसरे सर्फोजी यांच्यासारखे बहुआयामी व्यक्तिमत्व भारतीय इतिहासात विरळाच। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: जेव्हा उत्तर भारताचे राज्यकर्ते बदलत्या जागतिक परिस्थितीशी जुळवून घेताना धडपडत होते, तेव्हा सर्फोजी राजे भारतीय पारंपरिक ज्ञान आणि पाश्चात्य वैज्ञानिक विचार यांचा संगम घडवून आणत होते।

सर्फोजी राजे केवळ तमिळ भूमीतील एक मराठा राजा नव्हते; तर ते एक जागतिक दर्जाचे विचारवंत होते। त्यांनी सरस्वती महाल ग्रंथालयाची स्थापना केली, जे आज जगातील सर्वात महत्त्वाच्या हस्तलिखितांच्या संग्रहांपैकी एक मानले जाते। या ग्रंथालयात संस्कृत, तमिळ, मराठी, इंग्रजी आणि फ्रेंच अशा विविध भाषांमधील ज्ञानाचा खजिना आहे। वैद्यकीय क्षेत्रातही ते अग्रणी होते; त्यांनी ‘धन्वंतरी महाल’ नावाची वैद्यकीय संशोधन संस्था स्थापन केली, जिथे सुमारे २०० वर्षांपूर्वी डोळ्यांच्या शस्त्रक्रिया (Cataract surgeries) केल्या जात असत आणि रुग्णांच्या नोंदी (Case sheets) ठेवल्या जात असत। ते त्रिभाषिक शिक्षणाचे पुरस्कर्ते होते आणि स्वतःही अनेक भाषांमध्ये पारंगत होते।

उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की सर्फोजी राजे हे एका “प्रबुद्ध राज्यकर्त्याचे” (Enlightened Sovereign) प्रतीक आहेत, ज्या मॉडेलला दक्षिण भारताने नेहमीच शारीरिक बळापेक्षा श्रेष्ठ मानले आहे। त्यांनी केवळ राज्य केले नाही, तर त्यांनी समाज सुशिक्षित केला। त्यांनी केवळ राजवाडे बांधले नाहीत, तर त्यांनी प्रयोगशाळा आणि ग्रंथालये उभारली। ही वैचारिक शिस्तच दक्षिण भारतीय मानसिकतेचे वैशिष्ट्य आहे। आज दक्षिण भारत शिक्षण आणि विज्ञानाला इतके महत्त्व का देतो, हे समजून घेण्यासाठी सर्फोजी राजांसारख्या विद्वान राजांचा वारसा अभ्यासावा लागेल। ते हे सिद्ध करतात की मराठी-तमिळ नाते हे केवळ राजकीय नव्हते, तर तो एक वैचारिक आविष्कार होता ज्याने संपूर्ण भारताला समृद्ध केले।