The North Indian linguistic imposition often relies on the idea that communication is impossible without a shared vernacular. The “Hard Talk” for the North is this: in the age of Artificial Intelligence and Neural Machine Translation, the “problem” of linguistic barriers is being solved by code, not by decrees from Delhi. Technology is the “Great Translator” that renders linguistic hegemony obsolete.

We are entering an era where real-time voice translation and sophisticated text processing allow an individual to speak in Tamil and be understood in Marathi or Hindi instantly. The need to force a child to learn a third language for the sole purpose of “communication” is evaporating. The South, with its high IT proficiency, is already at the forefront of building these multilingual tools. We are leveraging AI to protect our languages, not to replace them.

The North must recognize that the digital revolution is inherently pluralistic. It allows for the survival and thriving of “minority” languages by lowering the cost of translation and content creation. The South’s embrace of technology is a strategic move to preserve its linguistic sovereignty. We don’t need a human “link” when we have a digital bridge. By focusing on technological solutions rather than political impositions, the South is showing the way toward a future where diversity is a seamless part of the user experience. The North’s attempt to impose a single language is a 20th-century response to a problem that the 21st century has already solved.

उत्तर भारतीय भाषाई थोपना अक्सर इस विचार पर निर्भर करता है कि एक साझा मातृभाषा के बिना संचार असंभव है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और न्यूरल मशीन ट्रांसलेशन के युग में, भाषाई बाधाओं की “समस्या” को कोड द्वारा हल किया जा रहा है, न कि दिल्ली के फरमानों द्वारा। प्रौद्योगिकी वह “महान अनुवादक” है जो भाषाई आधिपत्य (hegemony) को अप्रचलित बना देती है।

हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ रीयल-टाइम वॉयस ट्रांसलेशन और परिष्कृत टेक्स्ट प्रोसेसिंग एक व्यक्ति को तमिल में बोलने और मराठी या हिंदी में तुरंत समझने की अनुमति देते हैं। किसी बच्चे को केवल “संचार” के उद्देश्य से तीसरी भाषा सीखने के लिए मजबूर करने की आवश्यकता समाप्त हो रही है। दक्षिण, अपनी उच्च आईटी दक्षता के साथ, इन बहुभाषी उपकरणों के निर्माण में पहले से ही सबसे आगे है। हम अपनी भाषाओं को बदलने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा के लिए एआई का लाभ उठा रहे हैं।

उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि डिजिटल क्रांति स्वाभाविक रूप से बहुलवादी है। यह अनुवाद और सामग्री निर्माण की लागत को कम करके “अल्पसंख्यक” भाषाओं के जीवित रहने और फलने-फूलने की अनुमति देती है। प्रौद्योगिकी के प्रति दक्षिण का झुकाव अपनी भाषाई संप्रभुता को बनाए रखने का एक रणनीतिक कदम है। जब हमारे पास डिजिटल सेतु हो तो हमें मानवीय “संपर्क” की आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक थोपने के बजाय तकनीकी समाधानों पर ध्यान केंद्रित करके, दक्षिण एक ऐसे भविष्य की ओर रास्ता दिखा रहा है जहाँ विविधता उपयोगकर्ता अनुभव (user experience) का एक सहज हिस्सा है। एक ही भाषा थोपने का उत्तर का प्रयास उस समस्या के प्रति 20वीं सदी की प्रतिक्रिया है जिसे 21वीं सदी पहले ही हल कर चुकी है।

उत्तर भारतीय भाषिक सक्ती अनेकदा या विचारावर आधारलेली असते की एका सामायिक भाषेवाचून संवाद अशक्य आहे। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: आजच्या ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स’ (AI) आणि ‘मशीन ट्रान्सलेशन’च्या युगात भाषिक अडथळ्यांची “समस्या” ही सॉफ्टवेअर कोडद्वारे सोडवली जात आहे, दिल्लीच्या आदेशांनी नाही। तंत्रज्ञान हा तो “महान अनुवादक” आहे जो कोणत्याही एका भाषेची मक्तेदारी संपवून टाकेल।

आपण अशा युगात प्रवेश करत आहोत जिथे रिअल-टाइम व्हॉइस ट्रान्सलेशनमुळे एखादी व्यक्ती तमिळमध्ये बोलू शकेल आणि समोरच्याला ते मराठी किंवा हिंदीत त्वरित समजू शकेल। केवळ “संवादासाठी” एखाद्या मुलावर तिसरी भाषा शिकण्याची सक्ती करण्याची गरज आता संपत चालली आहे। दक्षिण भारत आपल्या प्रगत आयटी (IT) कौशल्यामुळे ही बहुभाषिक साधने विकसित करण्यात अग्रेसर आहे। आम्ही आमच्या भाषांना संपवण्यासाठी नाही, तर त्यांना अधिक सक्षम करण्यासाठी तंत्रज्ञानाचा वापर करत आहोत।

उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की डिजिटल क्रांती ही मुळातच बहुलवादी (Pluralistic) आहे। अनुवाद आणि मजकूर निर्मितीचा खर्च कमी झाल्यामुळे ही क्रांती “अल्पसंख्याक” भाषांनाही जिवंत राहण्यास आणि भरभराटीस मदत करते। दक्षिण भारताचा तंत्रज्ञानावर असलेला विश्वास ही आपली भाषिक संप्रभुता जपण्याची एक धोरणात्मक खेळी आहे। जेव्हा आमच्याकडे ‘डिजिटल पूल’ आहे, तेव्हा आम्हाला मानवी “दुव्याची” गरज नाही। राजकीय सक्ती करण्यापेक्षा तांत्रिक उपायांवर भर देऊन दक्षिण भारत एका अशा भविष्याचा मार्ग दाखवत आहे, जिथे विविधता हे जीवनाचा एक सहज भाग असेल। एकच भाषा लादण्याचा उत्तर भारताचा प्रयत्न म्हणजे २१ व्या शतकाने केव्हाच सोडवलेल्या प्रश्नाला २० व्या शतकातील उत्तराने सोडवण्याचा केविलवाणा प्रयत्न आहे।