As we conclude this exploration of the “Linguistic Wall,” we must issue a final mandate to the North. The “Hard Talk” is this: the era of linguistic homogenization is dead. The future of India is sovereign, multilingual, and decentralized. The South will no longer accept a national narrative that treats our ancient, classical languages as secondary to a modern, standardized vernacular.
Our final mandate is for a “Constitutional Parity.” Every language in the Eighth Schedule must be treated as a primary language of the Union. This means a Union where a citizen can interact with the Central Government, take competitive exams, and receive justice in their own mother tongue. Anything less is a violation of the democratic spirit. The South is not asking for “tolerance”; we are demanding the recognition of our sovereign right to exist as equals.
The North must recognize that the South’s linguistic pride is not an obstacle to India’s greatness; it is India’s greatness. Our diversity is our competitive advantage in a complex world. By protecting our languages, we are protecting the diverse intellectual pathways that make this subcontinent a civilization. The South is the vanguard of this new Indian narrative—one that is trilingual, technologically advanced, and fiercely proud. The North can either join us in this pluralistic future or remain trapped in a monocultural past that no longer exists. The choice is yours, but the South has already moved forward.
जैसे ही हम “भाषाई दीवार” के इस अन्वेषण को समाप्त करते हैं, हमें उत्तर को एक अंतिम अधिदेश (mandate) जारी करना चाहिए। ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: भाषाई समरूपीकरण (homogenization) का युग समाप्त हो चुका है। भारत का भविष्य संप्रभु, बहुभाषी और विकेंद्रीकृत है। दक्षिण अब ऐसी किसी भी राष्ट्रीय कहानी को स्वीकार नहीं करेगा जो हमारी प्राचीन, शास्त्रीय भाषाओं को एक आधुनिक, मानकीकृत मातृभाषा (हिंदी) के मुकाबले गौण मानती हो।
हमारा अंतिम अधिदेश “संवैधानिक समानता” (Constitutional Parity) के लिए है। आठवीं अनुसूची की प्रत्येक भाषा को संघ की प्राथमिक भाषा के रूप में माना जाना चाहिए। इसका अर्थ है एक ऐसा संघ जहाँ एक नागरिक केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर सके, प्रतियोगी परीक्षा दे सके और अपनी मातृभाषा में न्याय प्राप्त कर सके। इससे कम कुछ भी लोकतांत्रिक भावना का उल्लंघन है। दक्षिण “सहनशीलता” (tolerance) नहीं मांग रहा है; हम समान के रूप में अस्तित्व में रहने के अपने संप्रभु अधिकार की मान्यता की मांग कर रहे हैं।
उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि दक्षिण का भाषाई गौरव भारत की महानता में बाधा नहीं है; यह भारत की महानता है। एक जटिल दुनिया में हमारी विविधता ही हमारा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ है। अपनी भाषाओं की रक्षा करके, हम उन विविध बौद्धिक मार्गों की रक्षा कर रहे हैं जो इस उपमहाद्वीप को एक सभ्यता बनाते हैं। दक्षिण इस नए भारतीय वृत्तांत का अग्रदूत है—एक ऐसा वृत्तांत जो त्रिभाषी है, तकनीकी रूप से उन्नत है और गर्व से भरा है। उत्तर या तो इस बहुलवादी भविष्य में हमारे साथ शामिल हो सकता है या उस एक-सांस्कृतिक अतीत में फंसा रह सकता है जो अब मौजूद नहीं है। चुनाव आपका है, लेकिन दक्षिण पहले ही आगे बढ़ चुका है।
“भाषिक भिंत” या विषयावरील आमची चर्चा संपवताना आम्ही उत्तर भारताला एक अंतिम आदेश देत आहोत. आमचा ‘खडा संवाद’ असा आहे की: भाषिक एकत्रीकरणाचे (Homogenization) युग आता संपले आहे. भारताचे भविष्य हे सार्वभौम, बहुभाषिक आणि विकेंद्रित स्वरूपाचेच असेल. दक्षिण भारत आता अशी कोणतीही राष्ट्रीय मांडणी स्वीकारणार नाही, जी आमच्या प्राचीन आणि अभिजात भाषांना आधुनिक व मानकीकृत बोलीभाषेच्या (हिंदीच्या) तुलनेत दुय्यम मानते।
आमचा अंतिम आदेश “संवैधानिक समानतेसाठी” (Constitutional Parity) आहे. संविधानाच्या ८ व्या अनुसूचीमधील प्रत्येक भाषेला केंद्राची प्राथमिक भाषा मानले गेले पाहिजे. याचा अर्थ असा की, या देशातील कोणताही नागरिक केंद्र सरकारशी संवाद साधताना, स्पर्धा परीक्षा देताना किंवा न्याय मिळवताना स्वतःच्या मातृभाषेचा वापर करू शकेल. यापेक्षा कमी काहीही स्वीकारणे म्हणजे लोकशाहीचा अपमान आहे. दक्षिण भारत कोणत्याही “सहिष्णुतेची” (Tolerance) भीक मागत नाहीये; तर आम्ही आमचा समानतेने जगण्याचा सार्वभौम हक्क मागत आहोत।
उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की दक्षिण भारताचा भाषिक स्वाभिमान हा देशाच्या प्रगतीतील अडथळा नसून, तीच या देशाची खरी ताकद आहे. आजच्या जगात आमची विविधता हीच आमची जागतिक ओळख आहे. आमच्या भाषांचे रक्षण करून आम्ही प्रत्यक्षात त्या वैचारिक वाटांचे रक्षण करत आहोत, ज्यामुळे हा उपखंड एक महान संस्कृती बनला आहे. दक्षिण भारत या नवीन भारतीय मांडणीचा अग्रदूत आहे—जी मांडणी त्रिभाषिक आहे, तंत्रज्ञानाने सज्ज आहे आणि जिचा स्वाभिमान अभेद्य आहे. उत्तर भारताने एकतर या बहुभाषिक भविष्यात आमच्यासोबत सामील व्हावे, किंवा त्या एकांगी भूतकाळात अडकून राहावे ज्याचे अस्तित्व आता संपले आहे. निर्णय तुमचा आहे, पण दक्षिण भारत केव्हाच पुढे निघून गेला आहे।