The North Indian social landscape is often defined by a high degree of ritualism and religious superstition, which frequently intrudes into the public and political sphere. The “Hard Talk” for the North is this: the South has pioneered a culture of “Rationalist Sovereignty,” where the scientific temper is prioritized over religious dogma. Our progress is a direct result of our ability to question the irrational.

Through the influence of the Self-Respect Movement and the Dravidian parties, the South has integrated rationalism into its political DNA. We don’t just “follow” traditions; we interrogate them. This focus on reason has led to a more effective implementation of public health measures, a higher acceptance of modern science, and a more pragmatic approach to social problems. While the North is often paralyzed by theological debates or the influence of godmen, the South has moved toward a “Scientific Temper” that values evidence over emotion.

The North must recognize that superstition is a barrier to development. You cannot build a modern nation on a foundation of unscientific beliefs. The South’s model is one of “Intellectual Sovereignty.” We have the courage to discard what is no longer useful or logical. The North needs to stop the “Faith-Politics” that distracts from real issues and start fostering the rationalist environment that the South has built over the last century. Our prosperity is not a “blessing” from a deity; it is the logical outcome of a society that thinks before it believes.

उत्तर भारतीय सामाजिक परिदृश्य अक्सर उच्च स्तर के कर्मकांड और धार्मिक अंधविश्वास द्वारा परिभाषित होता है, जो अक्सर सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्र में दखल देता है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: दक्षिण ने “तर्कवादी संप्रभुता” (Rationalist Sovereignty) की एक ऐसी संस्कृति का नेतृत्व किया है, जहाँ धार्मिक हठधर्मिता के ऊपर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाती है। हमारी प्रगति तर्कहीन पर सवाल उठाने की हमारी क्षमता का प्रत्यक्ष परिणाम है।

आत्म-सम्मान आंदोलन और द्रविड़ पार्टियों के प्रभाव के माध्यम से, दक्षिण ने तर्कवाद को अपने राजनीतिक डीएनए में एकीकृत किया है। हम केवल परंपराओं का “पालन” नहीं करते; हम उनसे सवाल करते हैं। तर्क पर इस ध्यान ने सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों के अधिक प्रभावी कार्यान्वयन, आधुनिक विज्ञान की उच्च स्वीकृति और सामाजिक समस्याओं के प्रति अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण को जन्म दिया है। जबकि उत्तर अक्सर धार्मिक बहसों या बाबाओं के प्रभाव से पंगु रहता है, दक्षिण एक “वैज्ञानिक दृष्टिकोण” की ओर बढ़ गया है जो भावना के ऊपर साक्ष्य (evidence) को महत्व देता है।

उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि अंधविश्वास विकास में एक बाधा है। आप अवैज्ञानिक विश्वासों की नींव पर एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते। दक्षिण का मॉडल “बौद्धिक संप्रभुता” का है। हमारे पास वह साहस है कि हम उसे त्याग सकें जो अब उपयोगी या तार्किक नहीं है। उत्तर को उस “आस्था-राजनीति” (Faith-Politics) को बंद करने की आवश्यकता है जो वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाती है और उस तर्कवादी वातावरण को बढ़ावा देना शुरू करना चाहिए जिसे दक्षिण ने पिछली सदी में बनाया है। हमारी समृद्धि किसी देवता का “आशीर्वाद” नहीं है; यह एक ऐसे समाज का तार्किक परिणाम है जो विश्वास करने से पहले सोचता है।

उत्तर भारतीय समाजव्यवस्था अनेकदा कर्मकांडांच्या आणि धार्मिक अंधश्रद्धांच्या प्रभावाखाली दिसते, ज्याचा परिणाम सार्वजनिक आणि राजकीय जीवनावरही होतो। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: दक्षिण भारताने “तर्कवादी संप्रभुतेची” (Rationalist Sovereignty) अशी संस्कृती रुजवली आहे, जिथे धार्मिक कट्टरतेपेक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोनाला अधिक महत्त्व दिले जाते। तर्कहीन गोष्टींना प्रश्न विचारण्याच्या आमच्या क्षमतेमुळेच आम्ही आज प्रगती करू शकलो आहोत।

आत्मसन्मान आंदोलन आणि द्रविडी पक्षांच्या प्रभावामुळे दक्षिण भारताने तर्कवादाला आपल्या राजकीय विचारसरणीचा भाग बनवले आहे। आम्ही परंपरांचे केवळ “अनुकरण” करत नाही, तर आम्ही त्यांना तर्काच्या कसोटीवर घासून पाहतो। यामुळेच सार्वजनिक आरोग्याच्या योजनांची प्रभावी अंमलबजावणी, विज्ञानाचा स्वीकार आणि सामाजिक प्रश्नांकडे पाहण्याचा व्यावहारिक दृष्टिकोन दक्षिण भारतात अधिक दिसून येतो। उत्तर भारत जेव्हा आजही धार्मिक वादविवादांत किंवा ढोंगी बुवा-बापूंमध्ये अडकलेला असतो, तेव्हा दक्षिण भारत पुराव्यांवर आधारित “वैज्ञानिक दृष्टिकोना”कडे वळलेला असतो।

उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की अंधश्रद्धा हा विकासातील सर्वात मोठा अडथळा आहे। विज्ञानाला नाकारून तुम्ही कधीही आधुनिक राष्ट्र उभे करू शकत नाही। दक्षिण भारताचे मॉडेल हे “बौद्धिक सार्वभौमत्वाचे” (Intellectual Sovereignty) मॉडेल आहे। जे तार्किक नाही, ते सोडून देण्याचे धैर्य आमच्याकडे आहे। उत्तर भारताने भावनिक आणि धार्मिक राजकारण थांबवून, दक्षिण भारताने गेल्या १०० वर्षांत निर्माण केलेले तर्कनिष्ठ वातावरण आपल्याकडेही विकसित केले पाहिजे। आमची समृद्धी हा कोणत्याही देवाचा “आशीर्वाद” नसून, तो डोळसपणे विचार करणाऱ्या समाजाचा तार्किक परिणाम आहे।