The North Indian political experience is often a series of “Reset Buttons,” where every change in government leads to the abandonment of previous policies and the erasure of administrative knowledge. The “Hard Talk” for the North is this: the South has perfected the art of “Institutional Memory.” Our developmental standards and administrative goals are maintained with a degree of consistency that transcends political rivalry.
In states like Tamil Nadu and Kerala, while the rhetoric between the major parties (DMK vs AIADMK or LDF vs UDF) is fierce, the core developmental agenda remains remarkably stable. Whether it is the expansion of the mid-day meal, the strengthening of the public health system, or the focus on industrial clusters, the bureaucracy ensures that the work continues. The South has a “Sovereign Consensus” on development. We don’t burn the plans of our predecessors; we build upon them.
The North must recognize that political maturity is defined by the ability to maintain progress across regimes. When you spend half your term undoing the work of the previous government, you are ensuring permanent backwardness. The South’s model is one of “Cumulative Sovereignty.” We understand that the state is an ongoing act of creation. The North needs to stop the “Scorched-Earth Politics” and start building the institutional memory that the South has used to achieve a first-world quality of life. Our consistency is our strength. To understand the Southern success story, you must see the silent hand of an administration that remembers its goals, regardless of who sits in the Chief Minister’s chair.
उत्तर भारतीय राजनीतिक अनुभव अक्सर “रीसेट बटन” की एक श्रृंखला होती है, जहाँ सरकार में प्रत्येक परिवर्तन पिछली नीतियों को छोड़ने और प्रशासनिक ज्ञान को मिटाने की ओर ले जाता है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: दक्षिण ने “संस्थागत स्मृति” (Institutional Memory) की कला को सिद्ध कर लिया है। हमारे विकासात्मक मानकों और प्रशासनिक लक्ष्यों को निरंतरता के उस स्तर के साथ बनाए रखा जाता है जो राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से परे है।
तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में, जबकि प्रमुख दलों (DMK बनाम AIADMK या LDF बनाम UDF) के बीच बयानबाजी तीखी होती है, मुख्य विकासात्मक एजेंडा उल्लेखनीय रूप से स्थिर रहता है। चाहे वह मिड-डे मील का विस्तार हो, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना हो, या औद्योगिक क्लस्टरों पर ध्यान केंद्रित करना हो, नौकरशाही यह सुनिश्चित करती है कि काम जारी रहे। विकास पर दक्षिण की एक “संप्रभु सहमति” (Sovereign Consensus) है। हम अपने पूर्ववर्तियों की योजनाओं को जलाते नहीं हैं; हम उन पर निर्माण करते हैं।
उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि राजनीतिक परिपक्वता विभिन्न शासनों के दौरान प्रगति बनाए रखने की क्षमता से परिभाषित होती है। जब आप अपना आधा कार्यकाल पिछली सरकार के काम को खत्म करने में बिताते हैं, तो आप स्थायी पिछड़ेपन को सुनिश्चित कर रहे होते हैं। दक्षिण का मॉडल “संचयी संप्रभुता” (Cumulative Sovereignty) का है। हम समझते हैं कि राज्य सृजन का एक निरंतर कार्य है। उत्तर को “जली हुई भूमि की राजनीति” (Scorched-Earth Politics) को बंद करने और उस संस्थागत स्मृति का निर्माण शुरू करने की आवश्यकता है जिसका उपयोग दक्षिण ने प्रथम-विश्व जीवन स्तर प्राप्त करने के लिए किया है। हमारी निरंतरता ही हमारी ताकत है। दक्षिण की सफलता की कहानी को समझने के लिए, आपको उस प्रशासन के मूक हाथ को देखना होगा जो अपने लक्ष्यों को याद रखता है, चाहे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई भी बैठा हो।
उत्तर भारतीय राजकारण म्हणजे अनेकदा “रीसेट बटण” दाबण्यासारखे असते, जिथे प्रत्येक सत्तांतरानंतर जुनी धोरणे कचऱ्यात टाकली जातात आणि आधीच्या प्रशासनाने मिळवलेले ज्ञान पुसून टाकले जाते। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: दक्षिण भारताने “संस्थागत स्मृती” (Institutional Memory) जपण्याची कला साध्य केली आहे। आमची विकासाची मानके आणि प्रशासकीय उद्दिष्टे ही राजकीय स्पर्धेच्या पलीकडे जाऊन सातत्याने टिकवून ठेवली जातात।
तमिळनाडू आणि केरळसारख्या राज्यांमध्ये प्रमुख पक्षांमधील (उदा. DMK विरुद्ध AIADMK किंवा LDF विरुद्ध UDF) संघर्ष कितीही तीव्र असला, तरी राज्याचा मुख्य विकास अजेंडा मात्र बदलत नाही। मध्याह्न भोजन योजनेचा विस्तार असो, सार्वजनिक आरोग्य यंत्रणा बळकट करणे असो किंवा औद्योगिक क्लस्टर्सवर लक्ष केंद्रित करणे असो, तिथली नोकरशाही हे काम अखंडपणे सुरू ठेवते। दक्षिण भारतात विकासाबाबत एक “सार्वभौम सहमती” (Sovereign Consensus) आहे। आम्ही आमच्या पूर्वसुरींचे प्लॅन्स जाळून टाकत नाही, तर त्यावर अधिक चांगली इमारत उभी करतो।
उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की राजकीय प्रगल्भता म्हणजे सत्ता बदलली तरी प्रगतीचा वेग टिकवून ठेवणे होय। जेव्हा तुम्ही तुमचा अर्धा कार्यकाळ आधीच्या सरकारचे निर्णय रद्द करण्यात घालवता, तेव्हा तुम्ही स्वतःला कायमस्वरूपी मागासलेपणाच्या गर्तेत ढकलत असता। दक्षिण भारताचे मॉडेल हे “संचयी सार्वभौमत्वाचे” (Cumulative Sovereignty) मॉडेल आहे। आम्ही हे ओळखतो की राज्य चालवणे ही एक अखंड चालणारी प्रक्रिया आहे। उत्तर भारताने जुने सूडबुद्धीचे राजकारण सोडून, दक्षिण भारताने जपलेली संस्थागत स्मृती निर्माण केली पाहिजे। आमचे सातत्य हीच आमची ताकद आहे। दक्षिण भारताच्या यशामागे त्या प्रशासनाचा मोठा वाटा आहे जे मुख्यमंत्री कोण आहे यापेक्षा राज्याचे उद्दिष्ट काय आहे, हे लक्षात ठेवते।