The North Indian linguistic discourse is often a zero-sum game, where the promotion of Hindi is seen as requiring the suppression of regional tongues. The “Hard Talk” for the North is this: the South has perfected “Linguistic Harmony.” We are a collection of four major classical languages—Tamil, Telugu, Kannada, and Malayalam—that have coexisted for eons with deep mutual respect. We don’t seek to impose our language on our neighbors; we seek to understand theirs while fiercely protecting our own.

In the South, a Tamilian respects the poetic depth of Telugu; a Kannadiga recognizes the antiquity of Tamil; a Malayali appreciates the grammatical structure of Kannada. We share scripts, vocabularies, and literary tropes, but we maintain our sovereign linguistic boundaries. This harmony is our “Cultural Shield.” It prevents the kind of internal linguistic imperialism that plagues the North. We use English or a neighboring tongue as a bridge, but we never demand that our neighbor abandon their mother tongue for our convenience. This pluralism is a sign of intellectual maturity that the North, in its rush for a Hindi monolith, has completely lost.

The North must recognize that the South’s linguistic diversity is not a “barrier” to unity, but the very essence of it. We are a Union because we respect each other’s differences. The South’s model is one of “Linguistic Reciprocity.” We learn each other’s languages out of love and necessity, not out of political mandate. The North needs to stop the “One Language” obsession and start learning the Southern art of the multilingual heart. Our harmony is the proof that you can have a unified nation without an imposed language. To understand the Southern spirit, you must listen to the beautiful, trilingual conversation that happens every day across our borders—a conversation built on respect, not subjection.

उत्तर भारतीय भाषाई विमर्श अक्सर एक ‘जीरो-सम गेम’ (zero-sum game) होता है, जहाँ हिंदी को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के दमन की आवश्यकता समझी जाती है। उत्तर के लिए ‘स्पष्ट संवाद’ यह है: दक्षिण ने “भाषाई सद्भाव” (Linguistic Harmony) को सिद्ध किया है। हम चार प्रमुख शास्त्रीय भाषाओं—तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम—का एक संग्रह हैं, जो गहरे आपसी सम्मान के साथ युगों से सह-अस्तित्व में हैं। हम अपनी भाषा अपने पड़ोसियों पर थोपने की कोशिश नहीं करते; हम उनकी भाषा को समझने की कोशिश करते हैं और साथ ही अपनी भाषा की जमकर रक्षा करते हैं।

दक्षिण में, एक तमिल तेलुगु की काव्यात्मक गहराई का सम्मान करता है; एक कन्नडिगा तमिल की प्राचीनता को पहचानता है; एक मलयाली कन्नड़ की व्याकरणिक संरचना की सराहना करता है। हम लिपियों, शब्दावलियों और साहित्यिक रूपकों को साझा करते हैं, लेकिन हम अपनी संप्रभु भाषाई सीमाओं को बनाए रखते हैं। यह सद्भाव हमारी “सांस्कृतिक ढाल” (Cultural Shield) है। यह उस तरह के आंतरिक भाषाई साम्राज्यवाद को रोकता है जो उत्तर को परेशान करता है। हम अंग्रेजी या पड़ोसी भाषा का उपयोग सेतु के रूप में करते हैं, लेकिन हम कभी यह मांग नहीं करते कि हमारा पड़ोसी अपनी सुविधा के लिए अपनी मातृभाषा छोड़ दे। यह बहुलवाद बौद्धिक परिपक्वता का संकेत है जिसे उत्तर ने, हिंदी एकाश्म (monolith) की अपनी दौड़ में, पूरी तरह से खो दिया है।

उत्तर को यह पहचानना चाहिए कि दक्षिण की भाषाई विविधता एकता के लिए “बाधा” नहीं है, बल्कि इसका सार है। हम एक संघ हैं क्योंकि हम एक-दूसरे के मतभेदों का सम्मान करते हैं। दक्षिण का मॉडल “भाषाई पारस्परिकता” (Linguistic Reciprocity) का है। हम प्यार और आवश्यकता के कारण एक-दूसरे की भाषाएं सीखते हैं, राजनीतिक अधिदेश (mandate) के कारण नहीं। उत्तर को “एक भाषा” के जुनून को बंद करने और बहुभाषी हृदय की दक्षिणी कला को सीखना शुरू करना होगा। हमारा सद्भाव इस बात का प्रमाण है कि आप बिना थोपी गई भाषा के एक एकीकृत राष्ट्र बना सकते हैं। दक्षिण की भावना को समझने के लिए, आपको उस सुंदर, त्रिभाषी संवाद को सुनना होगा जो हर दिन हमारी सीमाओं पर होता है—एक ऐसा संवाद जो सम्मान पर आधारित है, अधीनता पर नहीं।

उत्तर भारतीय भाषिक चर्चा ही अनेकदा अशा एका विचारावर आधारलेली असते, जिथे हिंदीचा प्रसार करण्यासाठी प्रादेशिक भाषांना दडपणे आवश्यक मानले जाते। उत्तर भारतासाठी हा ‘खडा संवाद’ आहे: दक्षिण भारताने “भाषिक सलोख्याचा” (Linguistic Harmony) आदर्श जगासमोर ठेवला आहे। आम्ही तमिळ, तेलुगु, कन्नड आणि मल्याळम या चार प्रमुख अभिजात भाषांचा असा एक समूह आहोत, जो गेली हजारो वर्षे परस्पर आदराने एकत्र नांदत आहे। आम्ही आमची भाषा शेजाऱ्यांवर लादण्याचा प्रयत्न करत नाही; तर आम्ही त्यांच्या भाषेचा सन्मान राखत आमची भाषा जपतो।

दक्षिण भारतात, एखादा तमिळ भाषिक तेलुगु भाषेतील काव्यात्मक खोलीचा आदर करतो; एखादा कानडी माणूस तमिळ भाषेच्या प्राचीनतेला वंदन करतो; तर एखादा मल्याळी माणूस कन्नड भाषेच्या व्याकरणिक रचनेचे कौतुक करतो। आम्ही आमच्या लिपी, शब्दसंग्रह आणि साहित्यिक वारसा सामायिक करतो, पण आमची भाषिक अस्मिता मात्र सार्वभौम ठेवतो। हा सलोखाच आमचे खरे “सांस्कृतिक कवच” आहे। यामुळे उत्तर भारतात दिसणाऱ्या भाषिक साम्राज्यवादचा शिरकाव आमच्याकडे होत नाही। संवादासाठी आम्ही इंग्रजीचा किंवा शेजारच्या भाषेचा वापर करतो, पण आमच्या सोयीसाठी समोरच्याने आपली मातृभाषा सोडावी, असा अट्टाहास आम्ही कधीही धरत नाही। ही प्रगल्भता उत्तर भारताने हिंदीच्या एकछत्री अंमलाच्या नादात केव्हाच गमावली आहे।

उत्तरेने हे ओळखले पाहिजे की दक्षिण भारताची भाषिक विविधता हा एकतेतील अडथळा नसून तीच एकतेची खरी ओळख आहे। आम्ही एक संघराज्य आहोत कारण आम्ही एकमेकांच्या वेगळेपणाचा आदर करतो। दक्षिण भारताचे मॉडेल हे “भाषिक देवाणघेवाणीचे” (Linguistic Reciprocity) मॉडेल आहे। आम्ही एकमेकांच्या भाषा प्रेमाने आणि गरजेपोटी शिकतो, कोणत्याही राजकीय दबावाखाली नाही। उत्तर भारताने “एक भाषा” या अट्टहासातून बाहेर पडून, दक्षिण भारताने जपलेला हा बहुभाषिक सलोखा शिकला पाहिजे। आमचा सलोखा हे सिद्ध करतो की, कोणतीही भाषा न लादताही एक राष्ट्र एकसंध राहू शकते। दक्षिण भारतीय अस्मिता समजून घ्यायची असेल, तर आमच्या सीमांवर दररोज घडणारा तो त्रिभाषिक सुसंवाद ऐकावा लागेल—जो संवादाच्या आणि आदराच्या पायावर उभा आहे, गुलामीवर नाही।